पंचायत में गांव की कितनी है झलक – रिव्यु पढ़े

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पंचायत में गांव की कितनी है झलक |  

जब आपको गांव गए हुए सालों हो जाते हैं..तो शानदार कॉन्सेप्ट और बेहतरीन किरदारों के साथ पंचायत बनता है। TVF की नई सीरीज़ पंचायत अपनी तमाम खूबियों के बावजूद निराश करती है। पंचायत के पास के वो सब कुछ था जिसके सहारे एक माइलस्टोन तैयार किया जा सकता था। मसलन फिल्म सिटी के अबु विलेज़ से दूर…रियल लोकेशन पे कहानी का फिल्मांकन, गांव की शैली और भाषा पे बारीकि से किया गया कमाल का काम। पर बात जब कंटेन्ट की आती है तो पंचायत बगल झांकने लगती है। बेशक़ कहानी का हीरो (पंचायत सचिव) करियर के जद्दोजहद में उलझा है पर गांव में आज भी समस्याओं का अंबार है। सरकार की हर योजना का क्रियान्वयन पंचायत ऑफिस से ही होता है। पर लेखक ने सुविधा के हिसाब से एक दो बातों पर नजऱ डाला और चलते बने।

दो एपिसोड के बाद कहानी की रफ्तार इस क़दर धीमी पड़ जाती है कि रफ़्तार बढ़ाने के लिए फॉरवर्ड ऑप्शन का सहारा लेना पड़ता है। जीतू, रधुवीर यादव और नीना गुप्ता के अलावा जिस किरदार ने दिल जीता है वो हैं चंदन रॉय। पंचायत ऑफ़िस सहायक की भूमिका में चंदन ने कमाल कर दिया है। दूसरे एपिसोड के बाद चंदन की एक्टिंग ही है जो आगे की कहानी देखने को प्रेरित करती है। शुरू के दो एपिसोड्स में पंचायत एक उम्मीद पैदा करती है। इस उम्मीद को सहारा देते हैं गांव की दीवार पे लिखे स्लोगन ” दो बच्चे हैं मिठी खीर, उससे ज्यादा बबासीर”। पर जैसे- जैसे कहानी आगे बढ़ती है नाउम्मीदी के बादल छाने लगते हैं और देखते ही देखते एक शानदार कॉन्सेप्ट को बेहतरीन निर्देशन में पर्दे पर उतारने की कोशिश धराशायी हो जाती है। और ये कसक मन में रह जाती है कि काश लेखक ने आज का गांव देख लिया होता..  आप इसे प्राइम वीडियोस पे देख सकते है

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